Wednesday, May 20, 2015

चिंता से चिंतन तक -रश्मि घटवाई :एक बार को हार या अपयश को पचाना आसान हो सकता है ,परन्तु जीत का उन्माद अत्यंत भयावह होता है।जीत को पचाना ऐरे-गैरोंका काम नहीं है।और फिर निरंतर सफलता प्राप्त करने के बाद जब कभी हार हो जाये,तो उसे झेलना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसीलिए अभिभावकोंके ऐसे कृत्य चिंता से चिंतन का विषय बन जाते हैं।

चिंता से चिंतन तक 
-रश्मि घटवाई 

परंतु कई ऐसे अभिभावक होते हैं ,जिनको इस बात का आकलन नहीं होता,इस बात में उन्हें कोई तथ्य नजर नहीं आता ।वे चाहते हैं ,कि उनका बेटा /बेटी बस प्रत्येक विषय में शत-प्रतिशत नंबर (marks)लाए ,क्लास में हमेशा फर्स्ट आए,प्रत्येक  स्पर्धा (competition)में प्रथम क्रमांक ही प्राप्त करे। दुर्भाग्यवश यदि बच्चा उनकी अपेक्षाओंकी पूर्ति नहीं करता है,या फिर असफल होता है,तो ऐसे अभिभावकों लगता है कि बच्चे ने उनकी आशाओंपर पानी फेर दिया है,समाज में उनकी  नाक कटवा दी है,या फिर समाज ही उनके बच्चेका घोर विरोधी है.वे मन ही मनमें निश्चित कर लेते हैं कि उनका बच्चा असाधारण प्रतिभाशाली होने के कारण अन्य लोग उनके बच्चे से ईर्ष्या करते हैं।उनकी ये सोच वे बच्चे के मन में भी डाल देते हैं। परिणामस्वरूप बच्चे के मन में यही बात सदा के लिये बैठ जाती है ।ऐसे अभिभावक, किसी drawing competition में बच्चा भाग ले रहा हो,तो पेन्सिल बच्चे के हाथ में पकड़ाकर स्वयं ड्राईंग बनाते हुए नज़र आएंगे।ऐसे अभिभावक,यदि उनके बच्चे को उनकी दृष्टी से महत्त्वपूर्ण काम न दिया गया हो तो आकाश-पाताल एक कर देंगे। "अगर मेरे बच्चे को नहीं लिया तो मैं भी काम नहीं करूँगी /करूँगा "धमकाते हुए नजर आएँगे।ऐसे अभिभावकोंका यथार्थ चित्रण फिल्म "तारे जमीं पर"में किया गया है।   

ऐसे अभिभावक यह तक नहीं जानते,कि वे स्वयं ही बच्चे के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। बच्चे के विकास में स्वयं ही बाधा बन रहे हैं।आगे चलकर ये बच्चे अपयश को स्वीकार करने में पूर्णत: असमर्थ हो जाते हैं। जीवन में सदैव किसी की जीत ही होगी ,यह संभव नहीं है। हार भी जीवन का एक अभिन्न अंग है। " If you can meet with Triumph and Disaster And treat those two impostors just the same,"रुडयार्ड किपलिंग ने अपनी सुप्रसिद्द कविता "इफ"में लिखा है.वह वस्तुत: भगवद्गीता के अध्याय 2 का श्लोक 38 ही है-"सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ, ततो युद्धाय यूज्यस्व,नैवं पापं अवाप्स्यसि " 

और यदि वे निरंतर जीतते गए ,तो... ?

याद रहें ,एक बार को हार या अपयश को पचाना आसान हो सकता है ,परन्तु जीत का उन्माद अत्यंत भयावह होता है।जीत को पचाना ऐरे-गैरोंका काम नहीं है।और फिर निरंतर सफलता प्राप्त करने के बाद जब कभी हार हो जाये,तो उसे झेलना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसीलिए अभिभावकोंके ऐसे कृत्य चिंता से चिंतन का विषय बन जाते हैं। 

Monday, May 5, 2014

"लम्हों ने ख़ता की थी,सदियों ने सज़ा पायी।" 

-रश्मि  घटवाई 

अपनेही पैरोंपर कुल्हाड़ी मारना क्या होता है,यह कोई कांग्रेस से सीखें।अपने दस वर्ष के कार्यकाल में कांग्रेस प्रणित यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार और घोटालों के सिवाय देश को कुछ भी नहीं दिया है।कहा जा रहा है,कि यूपीए के शासन काल में करीब साढ़े पाँच हजार लाख करोड़ रुपयोंका घोटाला हुआ है।कोई और होता,तो इस स्वर्णिम मौके का फायदा उठाकर दस साल इतना अच्छा शासन-प्रशासन देता,कि आनेवाली पीढ़ियाँ उन्हें याद रखतीं।इतिहास उस कार्यकाल की प्रशंसा करता।और तो और; जनता उन्हें बार बार सत्ता में लाना चाहतीं।लेकिन अब जनता अभूतपूर्व भ्रष्टाचार व घोटालों के कारण यूपीए सरकार को, उनके दस वर्ष के कार्यकाल को और कांग्रेस को हमेशा याद करती रहेगी।

हाल ही में प्रकाशित दो पुस्तकों ने कांग्रेसप्रणित यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार व घोटालों को उजागर किया है। जनता को जिसकी पहलेसे ही आशंका थी ,वह सत्य सामने लाया है। "द अ‍ॅक्सिडेन्टल प्राईम मिनिस्टर" संजय बारू लिखित पुस्तक में तो प्रधानमंत्री ने सत्ता का केन्द्र सोनिया गांधी होने की बात को स्वयं स्वीकार किया हुआ बताया है संजय बारू यूपीए-१ में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के मीडिया अ‍ॅडव्हायजर-अर्थात मीडिया सलाहकार थे।"क्रूसेडर ऑर कॉन्स्पिरेटर ?कोलगेट अ‍ॅण्ड द अदर ट्रूथस" इस दूसरी पुस्तक में कोयला मंत्रालय के सेवानिवृत्त सचिव पी सी पारख ने पूरे कोयला घोटाले का सच लोगों के सामने लाते हुए बताया है कि १. ८६ लाख करोड़ रुपये का कोयला घोटाला आखिर कैसे हुआ।ऐन चुनावोंके दौर में इन पुस्तकोंने कांग्रेस प्रणित यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार व घोटालों को जनता के सामने रखा है,जिसके कारण कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गयी है। सर्वे रिपोर्ट पहलेसे ही निर्देश दे रहे हैं कि इन चुनावोंमें कांग्रेस की ऐतिहासिक हार होगी।

"धिस बुक विल हेल्प रीडर्स अंडरस्टॅण्ड द कॉम्प्लेक्स रिलेशनशिप  बिटवीन द पीएम अ‍ॅण्ड द पार्टी प्रेसिडेन्ट" "द अ‍ॅक्सिडेन्टल प्राईम मिनिस्टर" पुस्तक में संजय बारू लिखते हैं।
 "इन यूपीए-१,ही( डॉ.मनमोहन सिंह)वॉज इन ऑफिस,बट ही वॉज नॉट इन पॉवर...  डॉ.सिंह वुड हॅव बीन वेल अवेअर ऑफ द लिमिटस् टू द प्राईम मिनिस्टरियल अथॉरिटी अंडर सच अ डिस्पेन्सेशन. ही सॉ हिमसेल्फ अ‍ॅज द अ‍ॅक्सिडेन्टल प्राईम मिनिस्टर… काँग्रेस'स्  अलाईज (allies)इन यूपीए-१ नॉमिनेटेड देअर ओन मिनिस्टर्स अ‍ॅण्ड बार्गेन्ड फॉर देअर पोर्टफोलियोज विथ सोनिया ,नॉट विथ  डॉ.सिंह ..अ‍ॅज फॉर सिनियर काँग्रेस लीडर्स,दे ओवड् देअर कॅबिनेट पोस्टस्  ऑलमोस्ट एन्टायरली टू सोनिया गांधी …व्हेन द कौन्सिल ऑफ मिनिस्टर्स वॉज रीशफल्ड ड्युरिंग द टर्म ऑफ यूपीए-१, डॉ.सिंह डिड हॅव मोअर ऑफ अ से ,बट ईव्हन सो,फ्यू ऑफ इटस्  मेम्बर्स एव्हर बिहेवड् अ‍ॅज इफ दे ओवड् देअर मिनिस्टरियल पोझिशनस् टू पीएम."बारू लिखते हैं।

सभी कांग्रेसी नेताओं की ईमानदारी प्राईम मिनिस्टर की बजाय सोनिया गांधी के प्रति समर्पित थी ,इसका वे विस्तार से  नामों समेत खुलासा करते हैं।
   
"पृथ्वीराज चव्हाण वॉज डॉ.सिंह'ज् प्रोटेजी(protege ), बट ही न्यू दॅट हिज पॉलिटिकल करीअर डिपेन्डेड ऑन डेमॉंंन्स्ट्रेटिंग लॉयल्टी टू सोनिया अ‍ॅण्ड राहुल... जयराम रमेश ऑट टू बी मोअर  डेमॉंंन्स्ट्रेटिव्ह ऑफ हिज लॉयल्टी टू द पीएम इफ ही वॉन्टेड  अ बर्थ इन द मिनिस्ट्री .अ‍ॅट लीस्ट यंगर काँग्रेस एमपीज् शुड फील दे ओवड् देअर मिनिस्टरियल बर्थ टू द पीएम रादर दॅन टू जस्ट सोनिया" बारू लिखते हैं।

"व्हॉट शुड डॉ.सिंह'ज् स्ट्रैटेजी बी ?शुड ही अझ्युम दॅट व्हाईल सोनिया वॉज द लीडर ऑफ द काँग्रेस ,ही वॉज द हेड ऑफ अ कोअलिशन गव्हर्नमेन्ट ,विथ नॉन - काँग्रेस कॉन्स्टिट्यूएन्ट्स ,इन्क्ल्युडिंग अ रिबेल लाईक … अ‍ॅण्ड कार्व्ह आउट हिज ओन पॉलिटिकल स्पेस अ‍ॅण्ड रिटेन अ‍ॅडमिनीस्ट्रेटिव्ह कंट्रोल ऑफ  गव्हर्नमेन्ट?ऑर शुड ही बी रनिंग एव्हरी डे टू  10 जनपथ ,सोनिया'ज् रेसिडन्स -कम -ऑफीस, टु टेक हर इंस्ट्रक्शन्स?हॅण्डलिंग द डेलिकेट इक्वेशन विथ सोनिया वॉज डॉ.सिंह'ज् फर्स्ट अ‍ॅण्ड बिगेस्ट पॉलिटिकल चॅलेंज."बारू आगे लिखते हैं। 

जब भूतपूर्व प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिंह राव का देहांत हुआ तो कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए कांग्रेस मुख्यालय में तक नहीं लाने दिया।इसपर करारी टिप्पणी करते हुए शीर्ष नेतृत्व की घिनौनी मानसिकता व गिरी हुई राजनीती का दर्शन बारू अपने पाठकों को कराते हैं। 
" नरसिंह राव'ज् चिल्ड्रेन वॉन्टेड द फॉर्मर पीएम टु बी क्रीमेटेड इन दिल्ली,लाईक अदर काँग्रेस प्राईम मिनिस्टर्स. इम्प्रेसिव्ह मेमोरियल्स हॅड बीन बिल्ट फॉर नेहरू ,इंदिरा अ‍ॅण्ड राजीव अ‍ॅट प्लेसेस व्हेअर दे  हॅड बीन क्रीमेटेड…  अहमद पटेल वॉन्टेड मी टु एन्करेज नरसिंह राव'ज् चिल्ड्रेन, टु टेक देअर फादर'स् बॉडी टू हैद्राबाद फॉर क्रीमेशन. … सोनिया डिड नॉट वॉन्ट अ मेमोरियल   फॉर राव एनीव्हेअर इन दिल्ली.द काँग्रेस पार्टी रिफ्युज्ड टु अलॉव  राव'ज् बॉडी टु बी ब्रॉट इन्टू द पार्टी'ज् हेडक्वार्टर ऑन इट्स वे टू एअरपोर्ट  अ‍ॅण्ड  सोनिया चोज नॉट टु बी प्रेझेन्ट अ‍ॅट द हैद्राबाद क्रीमेशन ," बारू लिखते हैं।

अर्थशास्त्र में अन्तर्राष्ट्रीय कीर्ति के विद्वान डॉ.मनमोहन सिंह सरकार में प्रधानमंत्री होने के बावजूद उन्हें न जाने कितनी बार अपमान सहना पड़ा।न्होंने मुझफ्फर रझ्मी की पंक्तिया संसद में सुनायी थीं- मानो उन्हीं की कहानी सुना रही  हों -"लम्हों ने ख़ता की थी,सदियों ने सज़ा पायी।" उनके सहयोगी मंत्रियों का उन्हें सहयोग मिलना तो दूर;उनके द्वारा किये गए घोटालों के ऊपर उन्हें आँखे मूँद कर,भ्रष्टाचार का मूक दर्शक बनना पड़ा।बारू द्वारा पूछने पर प्रधानमंत्री  डॉ.मनमोहन सिंह की  प्रतिक्रिया थी ,"लेट देम टेक ऑल द क्रेडिट.आय डू नॉट नीड इट.आय अ‍ॅम ओन्ली डूइंग माय वर्क. आय डू नॉट वॉन्ट एनी मीडिया प्रोजेक्शन."  डॉ.मनमोहन सिंह द्वारा किये गए अच्छे कार्योंका श्रेय गांधी परिवार को देने के लिए चाटुकार कांग्रेसी नेता तैयार ही थे। यदि २००९ के चुनावोंमे कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ता,तो वही चाटुकार कांग्रेसी नेता उस हार का ठीकरा डॉ.मनमोहन सिंह पर फोड़ते।

"If the Congress had lost,the blame for the defeat would have been placed squarely on the PM's shoulder....Now that the party was back in office,and that too with more numbers than anyone in the party had forecast,the credit would go to the party's 'first family.'To the scion and future leader.It was Rahul's victory,not Manmohan's."बारू लिखते हैं।

यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार व घोटालों के बारे में विस्तारपूर्वक बताते हुए वे कोयला घोटाले पर सटीक टिप्पणी करते हैं।"The scandal relating to the allocation of coal blocks during the period when Dr. Manmohan Singh handled the coal portfolio further tarnished the prime minister's image.Here too, he was charged,not with corruption,but with turning a blind eye to the corruption of others." 

इसी धागे को आगे बढ़ाते हुए "क्रूसेडर ऑर कॉन्स्पिरेटर ?कोलगेट अ‍ॅण्ड द अदर ट्रूथस"  पुस्तक  जिसमें पी सी पारख ने कोयला घोटाले का कच्चा चिट्ठा खोला है,प्रधानमंत्री के बारे में लिखते हैं,
"By continuing to head a government in which he had little political authority,his image has been seriously dented by 2G and Coalgate although he has had a spotless record of personal integrity." 

"भारत की अर्थव्यवस्था एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरकर आ रही है,और कुछ विशेषज्ञोंका मानना है,कि सन २०५० में वह विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था होगी।बढ़ती अर्थव्यवस्था को अधिक ऊर्जा की जरुरत पड़ेगी।भारत की ऊर्जा की दो तिहाई जरुरत कोयला पूरी करता है।भविष्य में भी भारत में कोयला ही  ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत होगा।कोयला-भण्डार तथा कोयला-उत्खनन को देखा जाए तो भारत विश्व में अग्रणी देशों में हैभारत में विपुल मात्रा में कोयला है।फिर भी कोयले की जितनी आवश्यकता है,उसकी आपूर्ति नहीं हो पाती।इसी के कारण कोयले में कालाबाज़ारी को बढ़ावा मिला है। कोयला माफिया सक्रिय हैं।कोल ब्लॉक आवंटन में पारदर्शिता का अभाव थाकोयला-उत्खनन व् उत्पादन के लिए पारदर्शिता के साथ नीलामी होना आवश्यक था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।फर्ज़ी कंपनिया बनाकर अपारदर्शिता के साथ उनको कोल ब्लॉक आवंटित कर दिए गए।कोल ब्लॉक आवंटन जब हुआ,तब कोयला मंत्रालय का कार्यभार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने संभाला हुआ था।कोल ब्लॉक आवंटन में पारदर्शिता का अभाव होने की बात CAG -सीएजी की रिपोर्ट में आयी।रिपोर्ट के मुताबिक इससे सरकारी खजाने को 1 लाख 86,000 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा और फायदा निजी कंपनियों ने कमाया।
    
"The Comptroller and Auditor General of India-CAG ,Mr.Vinod Rai did an excellent job of bringing the huge coal allocation scandal into the public domain....The CAG observed that the Screening Committee did not follow a transparent  and objective method....The CAG said that on account of abnormal delay of more than eight years in implementing a policy that the government itself had formulated,there was an undue financial gain of about 1.86 lakh crore to private parties.The gain was obviously at the cost of the exchequer... Open bidding for allocation of this resource was proposed way back in 2004.It does not require great intelligence to understand why it took over eight years to implement a transparent bidding system.The reason is simple and obvious:the entire political class of India was opposed to it."पारख लिखते हैं। उन्होंने पुस्तक में सभी कोयला मंत्रियों की काली करतूतोंपर विस्तारपूर्वक लिखा है। 

कोयला घोटाले में प्रधानमंत्री पर आरोप है कि उन्होंने निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया।परन्तु वास्तविकता में,डॉ.मनमोहन सिंह वॉज इन ऑफिस,बट ही वॉज नॉट इन पॉवर... ऐसा "द अ‍ॅक्सिडेन्टल प्राईम मिनिस्टर" पुस्तक में संजय बारू लिखते हैं।कई तथ्योंके साथ इस बात को उन्होंने साबित भी किया है। 
"...I have come to terms with this.There cannot be two centres of power.I have to accept that the party president is the centre of power."ऐसा स्वयं डॉ.मनमोहन सिंह ने माना है। ऐसे में , कोयला घोटाले के पीछे असली चेहरा किसका है,यह साफ़ नजर आने लगता है।         




               




Sunday, May 4, 2014

आनंदयात्रा
 - रश्मि घटवाई 
मनुष्य यही चाहता है,कि उसके जीवन में आनंद ही आनंद भरा हों.उसके जीवन में सदा खुशियाँ ही छायी रहें.फिर भी वह खुश नहीं है.आनंद की किरणें उसके चहु ओर बिखरी हुई होते हुए भी वह दु:खी हो जाता है,कि उसके जीवन में आनंद ही नहीं है.सूर्योदय, सूर्यास्त,रंगबिरंगे फूल, उनपर मंडरा रहीं रंगबिरंगी तितलियाँ,पक्षियों की सुरीली तान,हवा का झोंका,पहली वर्षा के साथ ही उठनेवाली मृदगंध(मिटटी की खुशबू)...इन साधारण सी बातों में भी कितना आनंद समाया हुआ है. परन्तु आनंद के जलप्रपातों की प्रतीक्षा में मनुष्य आनंद के इन तुषारों को भी अनदेखा कर देता है,जिनका उसपर निरंतर वर्षाव हो रहा है.
वास्तविकता तो यह है,की जीवन का आनंद तो छोटी-छोटी बातोंमे समाया हुआ है.क्योंकि हम यह मान कर चलते है,कि आनंद का अनुभव करने के लिए कारण भी बड़ा होना चाहिए और सृष्टि मेंसूर्योदय, सूर्यास्त जैसी ये घटनाएँ तो घटती रहती हैं,उनको क्या महत्त्व देना!पर धूप का महत्त्व तब समझ में आता है,जब वर्षा अथवा शीत काल में कई दिन सूर्य के दर्शन ही ना हो!पैदल चलने में भी अपार आनंद है.पर इसका अनुभव तब होता है,जब पैर में मोच आ जाए और चलने में कष्ट होने लगे.
यूँ तो पैदल सैर करने जैसा अन्य कोई व्यायाम प्रकार नहीं होगा,जो इतना सरल हो,व्यक्ति को भरपूर आनंद देता हो और उसे स्वस्थ रखता हो!पैदल चलने से - फिर व्यक्ति चाहे अपने में मग्न होकर,स्वयं से संवाद साधते हुए चला जा रहा है,या फिर बगीचे में दुतरफा सजे पेड़ों की कनातोंके नीचे से किसी राजा-महाराजाओंकी तरह चल रहा है- उसे एक अभूतपूर्व आनंद मिलता है.प्रतिदिन की इस पैदल सैर को हम और किसी अनोखे तरीके के साथ करते है,तब वह सैर यह कोई मामूली यात्रा नहीं रहती;वह एक आनंदयात्रा बन जाती है.

हर दिन कि  पैदल सैर को और भी अनूठी आनंदयात्रा कैसे बनाई जाए इसका मार्गदर्शन  Zen Guru Thich Nhat Hanh झेनगुरू थिच न्हात हान- लिखित पुस्तक "Walking Meditation" -वाकिंग मेडिटेशन में हमें पढने को मिलता है.
Nguyễn Xuân Bảo  यह उनका जन्म का नाम था.सोलह वर्ष की उम्र में उन्होंने  उनके देश में -विएतनाम में-बुद्धविहार में प्रवेश लिया तथा तेईस् वर्ष कि आयु में उन्हें  धर्मगुरू की उपाधि प्राप्त हुई तब उन्होंने थिच न्हात हान- Thich Nhat Hanh यह  धर्मनाम् धारण किया .चार दशकोंसे भी अधिक समय से वें  Walking Meditation की दीक्षा लोगोंको दे रहे हैं और आज तक  हजारो लोगोंने उनसे  Walking Meditation का तंत्र अवगत किया है.
"दुनिया में दु:ख है, भगवान बुद्ध ने यह पहली सीख दी है.दु:ख के अस्तित्व का ज्ञान होते ही(मन में) करुणा उत्पन्न होती है,और करुणा के उत्पन्न होते ही उस दु:ख से निजात पाने के लिए कोई रास्ता ढूँढने की प्रबल इच्छा निर्माण  होती है.मै फ़्रांस आया ,उससे पहले कई विएतनामी निर्वासित लोगोंको अनन्वित अत्याचारों का शिकार होते देखा,उनकी संपत्ति को लूट लिया गया ,उनको जान से मर डाला गया.इसके विपरीत पैरिस में दुकानों में  खचाखच सामान भरा था. हर तरफ समृद्धि थी.लोग आराम से कॉफी पी रहे थे.एकतरफ इतनी संपत्ति-समृद्धि  थी तो दूसरी और व्यथा और वेदना .यह विरोधाभास देखने के बाद,दु:ख को जानने के बाद, जीवन को खोखलेपन से ना जीने का मैंने निर्धार किया", झेनगुरू ने पुस्तक में लिखा है. 
पैदल चलने को वे ध्यान का प्रतिरूप मानते है.ध्यान के साथ पैदल चलने पर अभूतपूर्व आनंद की अनुभूति होती है और  वही एक आनंदयात्रा बन जाती है.

"Our walk is a peace walk. Our walk is a happiness walk.Then we learn  that there is no peace walk;that peace is the walk; that there is no happiness walk; that happiness is the walk." वें बताते हैं.
"To meditate is to learn how to stop being carried away by our regrets about the past,our anger or despair in the present or our worries about the future." Conscious Breathing-श्वास के ऊपर अपना ध्यान केंद्रित कर किस  प्रकार मन की  एकाग्रता को बढ़ाना है,इसके बारे में उन्होंने विस्तृत रूप से लिखा है ."When we walk in mindfulness, each step creates a fresh breeze of peace,joy and harmony."वें बताते हैं ,"On the ocean surface there are many waves-some high,some low,some beautiful and some less beautiful.All of them have a beginning and an end....from the point of view of the water,there is no beginning,no end,no up,no down, no birth,no death."
यह  तत्वज्ञान  भगवदगीता व ज्ञानेश्वरी में है.
"हे उपजे आणि नाशे/ते मायावशे दिसे//
येऱ्ह्व्ही तत्वता वस्तु जे असे/ते अविनाशचि//(५)
जैसे पवने तोय हलविले/आणि तरंगाकार जाहले/तरी कवण के जन्मले/म्हणोये तेथ//(६) 
तेंचि वायूचे स्फुरण ठेले/आणि उदक सपाट जाहले/तरी आता काय निमाले/विचारी पां//(७)( -ज्ञानेश्वरी अध्याय दुसरा.)
उत्पत्ती अथवा नाश  माया के कारण  दिखाई देते हैं अन्यथा वस्तुत:आत्मा अविनाशी ही  है .(५)हवा के बहने के  कारण  पानीपर तरंग उत्पन्न  होते हैं ,ऐसे में पानी के अलावा वहां और क्या उत्पन्न हुआ भला?(६ )हवा का बहना रुक जाने पर पानी स्थिर हुआ,तब पानी के अलावा वहाँ और किस चीज का विलय हुआ भला!(७)
हम अपने दु:ख पूरी तरह नष्ट तो नहीं कर सकते,परन्तु   प्रकृति की गोद में रहकर  हम उन्हें सहजता के साथ कैसे झेल सकते हैं,किसी भी संकट का सामना करने के लिए मानसिक बल कैसे प्राप्त कर सकते हैं इसका सुन्दर विवेचन उन्होंने इस पुस्तक में किया है.लेकिन केवळ अपनेही लिए चलना उन्हें मंजूर नहीं."हम स्वत: के लिए तो  पैदल चलेंगेही,उनके लिए भी हलेंगे,जो चल नहीं पातें!भूत, वर्त्तमान तथा भविष्य के सभी जीवोंके लिए हम चलेंगे."We walk for ourselves and we walk for those who cannot walk.We walk for all living beings-past,present and future." वे लिखते हैं.
पुनर्जन्म की वास्तविकता 
-रश्मि घटवाई 

नोएडा में रहनेवाली मेरी सहेली रात का खाना बनाने की तैयारी कर रही थी.अपनी सवा-डेढ़ साल की बेटी को रसोईघर के प्लेटफ़ॉर्म पर बिठाकर वह एक तरफ उससे ममता भरी बातें कर रही थी और दूसरी तरफ सब्जी भी काट रही थी.अचानक खाली बर्तनोंसे खेलते-खेलते वह नन्हीं-सी बालिका बोल उठी,"मम्मी मैं धाबा चलाती थी,मैं ही खाना बनाया करती थी.मेरे तीन बेटे थे.खाना मैं ही बनाती थी और मेरे तीन बेटे मेरी मदद करते थें. मेरा वह घर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है."वह बताने लगी.मेरी सहेली के तो जैसे होश ही उड़ गयें.एक बार जब मेरी सहेली नोएडा में किसी जगह गयी थी,तब एक विवक्षित दिशा में अंगुलिनिर्देश करते हुए वह अबोध बालिका एकाएक अपनी माँ से बोली,"मेरा घर उस तरफ है.मैं वहां रहती थी."मेरी सहेली के पांवोंतले से जैसे ज़मीन खिसक गयी.लेकिन बेटी जो कुछ बता रही थी,उसमें कितना तथ्य था,यह देखने का साहस वह नहीं जुटा पायी.यदि वह सच निकलता,तो बेटी पर वह परिवार अपना हक़ जताएगा,इस डर से मेरी सहेली ने बेटी को उस दिशा में पुन: न ले जाने का निश्चय किया.परन्तु बेटी जो बोल रही थी,वह सच होगा,धाबा चलनेवाली वह स्त्री पुनर्जन्म लेकर उसकी बेटी के रूप में आयी हैइस बात को उसका अंतर्मन नकार नहीं रहा था.

दिल्ली में रहनेवाले एक मराठी परिवार में जन्मी एक सवा साल की बालिका अपने माता-पिता को एक दिन बताने लगी,"माँमैं कलकत्ते में रहती थी.मैं छत से गिरी थी."पुनर्जन्म पर उस परिवार का पूरा विश्वास था,पर कलकत्ते में उनका कोई परिचित ना होने के कारण वे उसकी बातोंकी जांच-पड़ताल करा नहीं सके.वैसे भी उस पूर्व व्यक्तित्व को ढूंढ निकलना आसान नहीं होता.ऐसे में एक दिन उस बालिका के बाल कटवाने के लिए उसे लेकर उसकी माँ पार्लर गयी.जैसे ही हेअर ड्रेसर ने कैंची निकाली,वह बच्ची चीखने लगी, "बचाओ,बचाओ,मुझे बचाओ!"सारे लोग चकित होकर देखने लगेक्योंकि वह छोटीसी बच्ची ड़ों की तरह जान बचाने की गुहार लगा रही थी.उसकी माँ को तो यह देखकर झटका लगाक्योंकि कोई सम्भावना ही नहीं थी कि उस सवा साल की बच्ची को ये शब्द पता हो.वह परिवार टीवी भी नहीं देखता था,इसलिए किसी ने नाटकीय अंदाज में कहे ऐसे शब्दों को उस बच्ची ने टीवीपर सुना हो,यह भी संभव नहीं था.

ये दोनों बालिकाएं तथा उनके उच्च विद्या विभूषित परिवार मेरे परिचित हैं.इतनाही नहीं,ये घटनाएं भी मेरे सामने घटी हैं.वे  लोग अंधश्रद्धालू नहीं हैं.फिर भी पुनर्जन्म पर उनका पूरा विश्वास है.

जिस प्रकार मनुष्य फटे-पुराने वस्त्र त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है,उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है."जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च"जिस जीव का जन्म हुआ है,उसकी मृत्यु अटल है तथा जिसकी मृत्यु हुई है,उसका पुनर्जन्म निश्चित है,ऐसा वचन भगवद्गीता में है.परन्तु जन्ममृत्यु और पुन: जन्म इस पूरे चक्र पर हमारा ज्ञान अभी अपर्याप्त  है.

यद्यपि,पूर्वजन्मों की स्मृतियां- past life memories,मृत्यु के द्वार से लौटे लोगों के मृत्यु के  अनुभव-near death experiences  तथा पुनर्जन्म-reincarnation   विषयोंपर अमेरिका में, युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में भरपूर संशोधन हुआ है और यह संशोधन निरन्तर चल रहा है.इस  संशोधन में डॉ.इयान स्टीवेनसन-Dr. Ian Stevenson, M.D. की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है.वे युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में सायकियाट्री के प्रोफेसर तथा Division of Personality (अब Perceptual) Studies इस विभाग के डायरेक्टर थे .विश्व भर के जो व्यक्ति पूर्वजन्मों की स्मृतियां रखते थे तथा अपने विगत जन्मों के निवासस्थानरिश्तेदारवस्तूएंआदि के बारे में या फिर तब घटी घटनाओं के बारे में बता रहे थेऐसे २५०० व्यक्तियोंपर उन्होंने तथा उनके सहकर्मी संशोधकों ने मिलकर संशोधन किया हैउनमें से कई केसेस भारत व श्रीलंका में होने के कारण उन व्यक्तियों से मिलने भारत में भी वे कई बार आये.पूर्वजन्मों की स्मृतियोंके बारे में बतानेवाले भारत के उन व्यक्तियोंसे बातचीत कर के,उनकी स्मृतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके अपने ंशोधन के आधारपर उन्होंने निष्कर्ष निकाले. ‘Twenty Cases Suggestive of Reincarnation', 'European Cases of the Reincarnation Type', ‘Children Who Remember Previous Lives: A Question of Reincarnation' समेत १५ पुस्तकें, हजारों  लेख, साक्षात्कारडॉक्युमेंटरी फिल्म्स आदि के माध्यम से उनका संशोधनकार्य उनके पश्चात् भी अमर हो चुका है. 'Reincarnation and Biology: A contribution to the Etiology of Birthmarks and Birth Defects' इस magnum opus-अर्थात उनके अभूतपूर्व पुस्तक में उन्होंने २०० बच्चों के केसेस दिये है.उन बच्चों ने पिछले जन्मों के बारे में बताते हुए जख्मी होने कीतथा शरीर के जिन अवयवों को क्षति पहुंची होने की बात बताई थी,ठीक न्हीं  स्थानोंपर इस जन्म में उन बच्चों में जख्म के निशान पाए गए थे या फिर वे अवयव इस जन्म में भी जन्म से ही क्षतिग्रस्त रहे थे.एक बालिका ने पूर्व जन्म के बारे में बताते हुए कहा था की  वह तब  पुरुष थी तथा उसके हाथोंकी उँगलियाँ उस जन्म में कट चुकी थीं , इस जन्म में भी  उसके हाथोंकी उँगलियाँ जन्म से ही टेढ़ी मेढ़ी,क्षतिग्रस्त थीं .जिसके हाथोंकी उँगलियाँ जन्मत:ना के बराबर थी, ऐसे एक बालक ने पूर्व जन्म के बारे में बताते हुए कहा था की  वह तब दुसरे गाँव में रहता था तथा चारा कटाई के यंत्र में आकर उसके हाथोंकी उँगलियाँ कट गयी थीं.
डॉ.इयान स्टीवेनसन ने कुछ ऐसे भी केसेस पाए,जो अन्य विदेशी भाषा बड़ी सहजता के साथ बोलते थे,जो उन्होंने कभी सीखी भी  नहीं थी.उन्होंने इस क्षमता को  Xenoglossy  नाम दिया तथा उस संशोधन पर आधारित ‘Xenoglossy: A Review and Report of a Case' (Stevenson, 1974)’ Unlearned Language: New Studies in Xenoglossy' (Stevenson, 1984)’ नामक पुस्तकें लिखीं. 
  
युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में इंजिनीअरिंग में पीएचडी कर रही मेरी बेटी के पास मैं गयी थी. उसकी मदद  के कारण डॉ.इयान स्टीवेनसन द्वारा लिखित  अनेक पुस्तकों का  मैं वहां अध्ययन कर पायी.युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में पुनर्जन्म पर संशोधन निरन्तर चल रहा है,अत: विस्तृत जानकारी पाने के लिए मैंने विख्यात चाईल्ड सायकियाट्रीस्ट  Child and Family Psychiatry Clinic at the University of Virginia Health System  के मेडिकल डायरेक्टर डॉ.जिम बी.टकर Dr. Jim B. Tucker, M.D.से प्रत्यक्ष मिलकर बातचीत की.लगभग एक घंटे तक उन्होंने मुझे पुनर्जन्म के बारे में,बच्चों द्वारा बताये गए अनुभवों के बारे में विस्तृत व रोचक जानकारी दी.
 
अपने पूर्व जन्मों के स्मृतियों के बारे में बतानेवाले अमरिकी बच्चों के केसेस के ऊपर डॉ.टकर  काम करते हैं."Life Before Life –Children’s memories of previous life" नामक अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक उन्होंने लिखी है.अपनी इस पुस्तक में डॉ.जिम बी टकर ते हैं,कि कुछ  व्यक्ति, previous personality -अर्थात पूर्व जन्म का उनका पूर्व व्यक्तित्व जिस परिवार से था,उसी परिवार में पुनर्जन्म लेते हैं,कुछ व्यक्ति,उनका पूर्व व्यक्तित्व जिस गाँव में रहता था,उसी गाँव में अथवा आसपास के गाँव में पुनर्जन्म लेते हैं.अपने पूर्व जन्म के बारे में बतानेवाले बच्चें सामान्यत:दो-तीन साल की उम्र में पिछले जन्म के मातापिता,रिश्तेदार,परिचित लोग, निवासस्थान आदि के बारे में,पूर्व जन्म में घटी घटनाओं के बारे में एकाएक बताना शुरू कर देते हैं.छ:-सात साल की उम्र में सामान्यत:वे पूर्व जन्म की स्मृतियों को भूल जाते हैं. ७० प्रतिशत केसेस में उस पूर्व व्यक्तित्व की मृत्यु एक्सीडेंट जैसी किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना का शिकार होने के कारण या फिर हिंसा के कारण हुई होती है.  
"If a person dies violently or dies young, chances are greater that a child will one day report memories of that life . . . How those memories might be carried over, that we don't know.”,डॉ.टकर प्रत्यक्ष बातचीत के दरम्यान मुझे बताते हैं,“यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हिंसा के कारण या फिर बाल्यकाल में होती है,तो हो सता है, कि पुनर्जन्म होनेपर बच्चा उस पूर्व जन्म के बारे में बताने की सम्भावना तब अधिक होती है.बच्चें बहुत बारीकी से जानकारी देते हैं.लेकिन ये सारी बातें उन्होंने इधर उधर से सुनी हुई होती हैं,या फिर वास्तव में वह पूर्व व्यक्तित्व पुनर्जन्म लेकर आया है,यह बताना बहुत कठिन है.पर वे पर वे जिन घटनाओंके के बारे में बताते हैं वे अनुभव उस  व्यक्ति के जीवन में सचमुच आये होते हैं,उनके दृष्टिकोण में वे घटनाएं उस व्यक्ती के जीवन में सचमुच घटी होती हैं.लेकिन उनकी स्मृति अगले जन्म में कैसे संक्रमित होती है,यह हमें पता नहीं है. कुछ बच्चोंने पिछले जन्म में जानवर होने की बात बतायी.लेकिन उनके वे दावें कितने सच हैं,इसकी जाँच-पड़ताल करना असंभव है. बीस प्रतिशत बच्चों ने मृत्यु के बाद की घटनाओं का वर्णन किया. कुछ बच्चों ने दो जन्मों के बीच घटी घटनाएं बतायीं. कुछ बच्चों ने बताया कि मृत्यु के बाद उन्होंने यही समय बिताया,तो कुछ बच्चों ने स्वर्ग जैसे किसी अन्य स्थान पर गए होने की बात कही. भगवान, देवदूत या फिर सफ़ेद रंग की आकृतिया देखी होनेकी बात कुछ बच्चों ने बतायी. मृत्यु के बाद आए अप्रिय अनुभवों के बारे में भी कुछ बच्चों ने बताया. डॉ.टकर कहते हैं.
 
आधुनिक विज्ञान पुनर्जन्म के बारे में किसी ठोस निष्कर्ष तक अभी तक नहीं पहुंचा है. मनुष्य के मृत होने के साथ उसकी चेतना नष्ट होती है ऐसा मेडिकल सायन्स मानता है परन्तु बच्चों द्वारा बतायी गयी पूर्व जन्म की लगभग सभी बातों में वास्तविकता थी. उन्होंने पिछले जन्म के मातापिता,रिश्तेदार,परिचित लोग,निवासस्थान आदि के बारे में, पूर्व जन्म में घटी घटनाओं के बारे में जो-जो बताया था,वह सच निकला था. इस बात को देखें, पुनर्जन्म पर हुए अबतक के संशोधन को देखें तो संभवत: मृत्यु के बाद यह चेतना संक्रमित होती होगी, इस बात को नकारा नहीं जा सकता.हम अगर पुनर्जन्म को अंधश्रद्धा मानकर अनदेखा तो शायद हम किसी ऐसी बड़ी वैज्ञानिक खोज  से वंचित रह जायेंगे जो आगे चलकर मनुष्य जीवन की सारी कठिनाईयों को दूर कर दें.