पुनर्जन्म की वास्तविकता
-रश्मि घटवाई
नोएडा में रहनेवाली मेरी सहेली रात का खाना बनाने की तैयारी कर रही थी.अपनी सवा-डेढ़ साल की बेटी को रसोईघर के प्लेटफ़ॉर्म पर बिठाकर वह एक तरफ उससे ममता भरी बातें कर रही थी और दूसरी तरफ सब्जी भी काट रही थी.अचानक खाली बर्तनोंसे खेलते-खेलते वह नन्हीं-सी बालिका बोल उठी,"मम्मी मैं धाबा चलाती थी,मैं ही खाना बनाया करती थी.मेरे तीन बेटे थे.खाना मैं ही बनाती थी और मेरे तीन बेटे मेरी मदद करते थें. मेरा वह घर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है."वह बताने लगी.मेरी सहेली के तो जैसे होश ही उड़ गयें.एक बार जब मेरी सहेली नोएडा में किसी जगह गयी थी,तब एक विवक्षित दिशा में अंगुलिनिर्देश करते हुए वह अबोध बालिका एकाएक अपनी माँ से बोली,"मेरा घर उस तरफ है.मैं वहां रहती थी."मेरी सहेली के पांवोंतले से जैसे ज़मीन खिसक गयी.लेकिन बेटी जो कुछ बता रही थी,उसमें कितना तथ्य था,यह देखने का साहस वह नहीं जुटा पायी.यदि वह सच निकलता,तो बेटी पर वह परिवार अपना हक़ जताएगा,इस डर से मेरी सहेली ने बेटी को उस दिशा में पुन: न ले जाने का निश्चय किया.परन्तु बेटी जो बोल रही थी,वह सच होगा,धाबा चलनेवाली वह स्त्री पुनर्जन्म लेकर उसकी बेटी के रूप में आयी है, इस बात को उसका अंतर्मन नकार नहीं रहा था.
दिल्ली में रहनेवाले एक मराठी परिवार में जन्मी एक सवा साल की बालिका अपने माता-पिता को एक दिन बताने लगी,"माँ, मैं कलकत्ते में रहती थी.मैं छत से गिरी थी."पुनर्जन्म पर उस परिवार का पूरा विश्वास था,पर कलकत्ते में उनका कोई परिचित ना होने के कारण वे उसकी बातोंकी जांच-पड़ताल करा नहीं सके.वैसे भी उस पूर्व व्यक्तित्व को ढूंढ निकलना आसान नहीं होता.ऐसे में एक दिन उस बालिका के बाल कटवाने के लिए उसे लेकर उसकी माँ पार्लर गयी.जैसे ही हेअर ड्रेसर ने कैंची निकाली,वह बच्ची चीखने लगी, "बचाओ,बचाओ,मुझे बचाओ!"सारे लोग चकित होकर देखने लगे, क्योंकि वह छोटीसी बच्ची बड़ों की तरह जान बचाने की गुहार लगा रही थी.उसकी माँ को तो यह देखकर झटका लगा, क्योंकि कोई सम्भावना ही नहीं थी कि उस सवा साल की बच्ची को ये शब्द पता हो.वह परिवार टीवी भी नहीं देखता था,इसलिए किसी ने नाटकीय अंदाज में कहे ऐसे शब्दों को उस बच्ची ने टीवीपर सुना हो,यह भी संभव नहीं था.
ये दोनों बालिकाएं तथा उनके उच्च विद्या विभूषित परिवार मेरे परिचित हैं.इतनाही नहीं,ये घटनाएं भी मेरे सामने घटी हैं.वे लोग अंधश्रद्धालू नहीं हैं.फिर भी पुनर्जन्म पर उनका पूरा विश्वास है.
जिस प्रकार मनुष्य फटे-पुराने वस्त्र त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है,उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है."जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च"जिस जीव का जन्म हुआ है,उसकी मृत्यु अटल है तथा जिसकी मृत्यु हुई है,उसका पुनर्जन्म निश्चित है,ऐसा वचन भगवद्गीता में है.परन्तु जन्म, मृत्यु और पुन: जन्म इस पूरे चक्र पर हमारा ज्ञान अभी अपर्याप्त है.
यद्यपि,पूर्वजन्मों की स्मृतियां- past life memories,मृत्यु के द्वार से लौटे लोगों के मृत्यु के अनुभव-near death experiences तथा पुनर्जन्म-reincarnation इन विषयोंपर अमेरिका में, युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में भरपूर संशोधन हुआ है और यह संशोधन निरन्तर चल रहा है.इस संशोधन में डॉ.इयान स्टीवेनसन-Dr. Ian Stevenson, M.D. की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है.वे युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में सायकियाट्री के प्रोफेसर तथा Division of Personality (अब Perceptual) Studies इस विभाग के डायरेक्टर थे .विश्व भर के जो व्यक्ति पूर्वजन्मों की स्मृतियां रखते थे तथा अपने विगत जन्मों के निवासस्थान, रिश्तेदार, वस्तूएं, आदि के बारे में या फिर तब घटी घटनाओं के बारे में बता रहे थे, ऐसे २५०० व्यक्तियोंपर उन्होंने तथा उनके सहकर्मी संशोधकों ने मिलकर संशोधन किया है. उनमें से कई केसेस भारत व श्रीलंका में होने के कारण उन व्यक्तियों से मिलने भारत में भी वे कई बार आये.पूर्वजन्मों की स्मृतियोंके बारे में बतानेवाले भारत के उन व्यक्तियोंसे बातचीत कर के,उनकी स्मृतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके अपने संशोधन के आधारपर उन्होंने निष्कर्ष निकाले. ‘Twenty Cases Suggestive of Reincarnation', 'European Cases of the Reincarnation Type', ‘Children Who Remember Previous Lives: A Question of Reincarnation' समेत १५ पुस्तकें, हजारों लेख, साक्षात्कार, डॉक्युमेंटरी फिल्म्स आदि के माध्यम से उनका संशोधनकार्य उनके पश्चात् भी अमर हो चुका है. 'Reincarnation and Biology: A contribution to the Etiology of Birthmarks and Birth Defects' इस magnum opus-अर्थात उनके अभूतपूर्व पुस्तक में उन्होंने २०० बच्चों के केसेस दिये है.उन बच्चों ने पिछले जन्मों के बारे में बताते हुए जख्मी होने की, तथा शरीर के जिन अवयवों को क्षति पहुंची होने की बात बताई थी,ठीक उन्हीं स्थानोंपर इस जन्म में उन बच्चों में जख्म के निशान पाए गए थे या फिर वे अवयव इस जन्म में भी जन्म से ही क्षतिग्रस्त रहे थे.एक बालिका ने पूर्व जन्म के बारे में बताते हुए कहा था की वह तब पुरुष थी तथा उसके हाथोंकी उँगलियाँ उस जन्म में कट चुकी थीं , इस जन्म में भी उसके हाथोंकी उँगलियाँ जन्म से ही टेढ़ी मेढ़ी,क्षतिग्रस्त थीं .जिसके हाथोंकी उँगलियाँ जन्मत:ना के बराबर थी, ऐसे एक बालक ने पूर्व जन्म के बारे में बताते हुए कहा था की वह तब दुसरे गाँव में रहता था तथा चारा कटाई के यंत्र में आकर उसके हाथोंकी उँगलियाँ कट गयी थीं.
डॉ.इयान स्टीवेनसन ने कुछ ऐसे भी केसेस पाए,जो अन्य विदेशी भाषा बड़ी सहजता के साथ बोलते थे,जो उन्होंने कभी सीखी भी नहीं थी.उन्होंने इस क्षमता को Xenoglossy नाम दिया तथा उस संशोधन पर आधारित ‘Xenoglossy: A Review and Report of a Case' (Stevenson, 1974)’ व Unlearned Language: New Studies in Xenoglossy' (Stevenson, 1984)’ नामक पुस्तकें लिखीं.
युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में इंजिनीअरिंग में पीएचडी कर रही मेरी बेटी के पास मैं गयी थी. उसकी मदद के कारण डॉ.इयान स्टीवेनसन द्वारा लिखित अनेक पुस्तकों का मैं वहां अध्ययन कर पायी.युनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया में पुनर्जन्म पर संशोधन निरन्तर चल रहा है,अत: विस्तृत जानकारी पाने के लिए मैंने विख्यात चाईल्ड सायकियाट्रीस्ट व Child and Family Psychiatry Clinic at the University of Virginia Health System के मेडिकल डायरेक्टर डॉ.जिम बी.टकर Dr. Jim B. Tucker, M.D.से प्रत्यक्ष मिलकर बातचीत की.लगभग एक घंटे तक उन्होंने मुझे पुनर्जन्म के बारे में,बच्चों द्वारा बताये गए अनुभवों के बारे में विस्तृत व रोचक जानकारी दी.
अपने पूर्व जन्मों के स्मृतियों के बारे में बतानेवाले अमरिकी बच्चों के केसेस के ऊपर डॉ.टकर काम करते हैं."Life Before Life –Children’s memories of previous life" नामक अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक उन्होंने लिखी है.अपनी इस पुस्तक में डॉ.जिम बी टकर कहते हैं,कि कुछ व्यक्ति, previous personality -अर्थात पूर्व जन्म का उनका पूर्व व्यक्तित्व जिस परिवार से था,उसी परिवार में पुनर्जन्म लेते हैं,कुछ व्यक्ति,उनका पूर्व व्यक्तित्व जिस गाँव में रहता था,उसी गाँव में अथवा आसपास के गाँव में पुनर्जन्म लेते हैं.अपने पूर्व जन्म के बारे में बतानेवाले बच्चें सामान्यत:दो-तीन साल की उम्र में पिछले जन्म के मातापिता,रिश्तेदार,परिचित लोग, निवासस्थान आदि के बारे में,पूर्व जन्म में घटी घटनाओं के बारे में एकाएक बताना शुरू कर देते हैं.छ:-सात साल की उम्र में सामान्यत:वे पूर्व जन्म की स्मृतियों को भूल जाते हैं. ७० प्रतिशत केसेस में उस पूर्व व्यक्तित्व की मृत्यु एक्सीडेंट जैसी किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना का शिकार होने के कारण या फिर हिंसा के कारण हुई होती है.
"If a person dies violently or dies young, chances are greater that a child will one day report memories of that life . . . How those memories might be carried over, that we don't know.”,डॉ.टकर प्रत्यक्ष बातचीत के दरम्यान मुझे बताते हैं,“यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हिंसा के कारण या फिर बाल्यकाल में होती है,तो हो सता है, कि पुनर्जन्म होनेपर बच्चा उस पूर्व जन्म के बारे में बताने की सम्भावना तब अधिक होती है.बच्चें बहुत बारीकी से जानकारी देते हैं.लेकिन ये सारी बातें उन्होंने इधर उधर से सुनी हुई होती हैं,या फिर वास्तव में वह पूर्व व्यक्तित्व पुनर्जन्म लेकर आया है,यह बताना बहुत कठिन है.पर वे पर वे जिन घटनाओंके के बारे में बताते हैं वे अनुभव उस व्यक्ति के जीवन में सचमुच आये होते हैं,उनके दृष्टिकोण में वे घटनाएं उस व्यक्ती के जीवन में सचमुच घटी होती हैं.लेकिन उनकी स्मृति अगले जन्म में कैसे संक्रमित होती है,यह हमें पता नहीं है. कुछ बच्चोंने पिछले जन्म में जानवर होने की बात बतायी.लेकिन उनके वे दावें कितने सच हैं,इसकी जाँच-पड़ताल करना असंभव है. बीस प्रतिशत बच्चों ने मृत्यु के बाद की घटनाओं का वर्णन किया. कुछ बच्चों ने दो जन्मों के बीच घटी घटनाएं बतायीं. कुछ बच्चों ने बताया कि मृत्यु के बाद उन्होंने यही समय बिताया,तो कुछ बच्चों ने स्वर्ग जैसे किसी अन्य स्थान पर गए होने की बात कही. भगवान, देवदूत या फिर सफ़ेद रंग की आकृतिया देखी होनेकी बात कुछ बच्चों ने बतायी. मृत्यु के बाद आए अप्रिय अनुभवों के बारे में भी कुछ बच्चों ने बताया.” डॉ.टकर कहते हैं.
आधुनिक विज्ञान पुनर्जन्म के बारे में किसी ठोस निष्कर्ष तक अभी तक नहीं पहुंचा है. मनुष्य के मृत होने के साथ उसकी चेतना नष्ट होती है ऐसा मेडिकल सायन्स मानता है परन्तु बच्चों द्वारा बतायी गयी पूर्व जन्म की लगभग सभी बातों में वास्तविकता थी. उन्होंने पिछले जन्म के मातापिता,रिश्तेदार,परिचित लोग,निवासस्थान आदि के बारे में, पूर्व जन्म में घटी घटनाओं के बारे में जो-जो बताया था,वह सच निकला था. इस बात को देखें, पुनर्जन्म पर हुए अबतक के संशोधन को देखें तो संभवत: मृत्यु के बाद यह चेतना संक्रमित होती होगी, इस बात को नकारा नहीं जा सकता.हम अगर पुनर्जन्म को अंधश्रद्धा मानकर अनदेखा तो शायद हम किसी ऐसी बड़ी वैज्ञानिक खोज से वंचित रह जायेंगे जो आगे चलकर मनुष्य जीवन की सारी कठिनाईयों को दूर कर दें.